कुछ पल

वो रोज रात को अपने छत पर जाया करती थी, उस छत का वो कोना उसकी अपनी दुनिया थी। जमीन पर चटाई बिछाकर अपनी गृहस्थी के जीवन से अपने लिए कुछ पल चुराती थी ।

कोई नही था उसे समझने वाला…माँ बाप का देहांत बचपन मे ही हो गया था। बड़े भाइयों की शादी के बाद उसकी घर मे मौजूदगी बोझ सी लगने लगी थी उसकी भाभियों को, इसलिये जल्द से जल्द उसके हाथ पीले कर उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों से मुक्ति पा ली थी। ब्याह भी हुआ एक ऐसे इंसान से जिसे नशे के आगे खुद की भी सुध ना रहती थी। शादी के चार सालों में तीन बच्चों की माँ बन चुकी थी वो…

जैसे जैसे जिम्मेदारियों का बोझ बढ़ता गया, वह दिन प्रतिदिन न जाने कहाँ खोने लगी थी। उसकी दुनिया उसके बच्चों, पति , सास, ससुर में सिमट के रह गयी थी। वक़्त से पहले बूढ़ी हो चली थी। एक दिन किसी काम से छत पर जाना हुआ; ठंडी हवाओं के झोकों से ठिठक कर कुछ देर वही खड़ी हो गयी। नीचे से बच्चों की आवाज सुन के फिर नीचे चली गयी।

वो सुकून के दो पल उसे अच्छे लगे थे , ऐसा लगा जैसे वो उसका अपना समय था। बस तभी से रोज रात में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह कर के वो कुछ समय अपने साथ बिताने लगी।

बस चाँद, तारे और ठंडी हवाओ के साथ अपनी सारी शिकायतें वो आसमान में सुना देती थी ये सोच कर की शायद उसके भगवान उसे सुनते होंगे।

तभी नीचे से आवाज आई,” माँ! नीचे आओ, भूख लगी है।”

एक गहरी सांस लेते हुए वो उठ खड़ी हुई , फिर चल दी अपनी जिंदगी की ओर…

-पहली बार मैंने कुछ इस तरह का प्रयास किया है। कृपया सुधार के लिए मार्गदर्शन करें। आभार।

7 thoughts on “कुछ पल

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